प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और मंत्रियों को 30 दिन की गिरफ्तारी की स्थिति में पद से बर्खास्त करने वाले तीन अहम विधेयकों पर गठित संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) को लेकर विपक्षी एकता में दरार साफ दिखाई देने लगी है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के बाद अब समाजवादी पार्टी (SP) ने भी इस समिति का बहिष्कार कर दिया है। इससे कांग्रेस की स्थिति असमंजस में आ गई है, जो अब तक जेपीसी में शामिल होने के पक्ष में थी।
विधेयक की सोच पर अखिलेश यादव का तीखा विरोध
समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इस विधेयक को “गलत सोच” करार देते हुए कहा कि अगर गृह मंत्री अमित शाह खुद कह चुके हैं कि उन पर झूठे केस लगाए गए थे, तो फिर इस तरह के कानून का औचित्य ही क्या है। उन्होंने इसे भारत के संघीय ढांचे के खिलाफ बताया और कहा कि राज्य सरकारें अपने स्तर पर आपराधिक मामलों को वापस ले सकती हैं, जबकि केंद्र का हस्तक्षेप सीमित रहेगा।
TMC ने जेपीसी को बताया ‘तमाशा’
टीएमसी ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि वह इस समिति में कोई सदस्य नहीं भेजेगी। पार्टी ने जेपीसी को “दिखावा” बताते हुए कहा कि यह समिति पारदर्शिता के बजाय राजनीतिक औजार बन चुकी है। राज्यसभा सांसद डेरेक ओ’ब्रायन ने सोशल मीडिया पर सरकार को “कमजोर” बताते हुए आरोप लगाया कि पूरे मानसून सत्र में केंद्र रक्षात्मक रहा और कार्यवाही में बाधा डालने की कोशिशें करता रहा।
तीन विधेयक जो चर्चा में हैं
केंद्र शासित प्रदेश सरकार (संशोधन) विधेयक 2025, संविधान (130वां संशोधन) विधेयक 2025, जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन (संशोधन) विधेयक 2025 यह सभी विधेयक इन दिनों काफी ज्यादा चर्चा में बने हुए हैं. इन विधेयकों में प्रावधान है कि यदि कोई मंत्री, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री किसी गंभीर आरोप में लगातार 30 दिन तक जेल में रहता है, तो उसे पद से हटाया जा सकता है।
सरकार ने इन विधेयकों को मानसून सत्र के अंतिम दिनों में पेश किया और जेपीसी को निर्देश दिया है कि वह अपनी रिपोर्ट शीतकालीन सत्र में प्रस्तुत करे, जो नवंबर के तीसरे सप्ताह में संभावित है।
विपक्षी एकता पर सवाल
TMC और SP के बहिष्कार से विपक्षी INDIA गठबंधन की एकता पर सवाल उठने लगे हैं। कांग्रेस अब दबाव में है कि वह इस समिति में शामिल हो या विरोध की राह अपनाए। यह घटनाक्रम आगामी सत्रों में राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित कर सकता है।








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