Supreme Court SC/ST Bail Judgment: अनुसूचित जाति और जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 को भारत में दलितों और आदिवासियों को सामाजिक सुरक्षा देने के लिए बनाया गया था। यह कानून जातिगत हिंसा, अपमान और भेदभाव के खिलाफ एक मजबूत ढाल है। लेकिन समय-समय पर इसके दुरुपयोग और जमानत की प्रक्रिया को लेकर बहस होती रही है।
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मामला क्या था?Supreme Court SC/ST Bail Judgment
महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के दौरान एक दलित परिवार पर कथित रूप से हमला हुआ। एफआईआर में दर्ज था कि आरोपी ने लोहे की रॉड से हमला किया, जातिसूचक गालियाँ दीं और घर जलाने की धमकी दी। बॉम्बे हाईकोर्ट ने इसे राजनीतिक प्रेरणा वाला मामला मानते हुए आरोपी को अग्रिम जमानत दे दी।
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सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए कहा कि एससी/एसटी एक्ट के तहत दर्ज मामलों में अग्रिम जमानत तभी दी जा सकती है जब प्रथम दृष्टया यह साबित हो जाए कि आरोपी के खिलाफ कोई मामला नहीं बनता।
मुख्य निर्देश Supreme Court SC/ST Bail Judgment
- अदालतें इस स्तर पर ‘मिनी ट्रायल’ नहीं चला सकतीं।
- एफआईआर, पीड़ित के बयान और घटना का विवरण ही पर्याप्त माना जाएगा।
- धारा 18 के तहत अग्रिम जमानत पर रोक तभी हटेगी जब आरोप अधिनियम के दायरे से बाहर हों।
- अदालतों को संतुलन बनाना होगा: झूठे आरोपों से बचाव और वास्तविक पीड़ितों को न्याय।
सामाजिक संदेश
यह फैसला दलितों की गरिमा और सुरक्षा को लेकर न्यायपालिका की गंभीरता को दर्शाता है। यह न केवल कानून की व्याख्या करता है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि उत्पीड़न के मामलों में आरोपी को आसानी से राहत न मिले। साथ ही, यह झूठे आरोपों के खिलाफ भी एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की बात करता है।








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